
माँ दुर्गा जिनकी नवरात्रि में आराधना की जाती है
नारी में शक्ति का प्रतीक है
मात्र माँ दुर्गा की पूजा से ही कोई महिला
या पुरुष शक्तिशाली नहीं हो जाता
माँ दुर्गा द्वारा अतुल पराक्रमी दैत्यों का वध
किया गया
किया गया
रक्त बीज नामक राक्षस
जिसके हर रक्त की बूँद एक नए राक्षस को जन्म देती थी
का भी देवी दुर्गा द्वारा संहार किया गया
का भी देवी दुर्गा द्वारा संहार किया गया
आखिर इतनी शक्ति आई कहा से
नारी समाज के लिए
यह स्वयं में शक्ति जगाने का सूत्र हो सकता है
सर्व प्रथम विचार करते है तो पाते है
शिव साधना इसका प्रथम सूत्र है
माँ दुर्गा का अंश महाकाली शिव साधक थी
जिन्होंने कठोर तप किया था
दूसरा सूत्र है अगाध सौन्दर्य की स्वामिनी होने के बावजूद
चारित्रिक दृढ़ता थी
कथा आती है महिषासुर तथा अन्य दैत्यों द्वारा
विवाह के प्रस्ताव भेजे जाने के बावजूद
उन्होंने शिव के प्रति अपनी निष्ठा को नहीं छोड़ा था
तीसरा सूत्र है निर्भयता
सामान्य रूप से सभी प्राणी सिंह के डरते है
परन्तु माँ दुर्गा द्वारा सिंह की सवारी की जानी
यह दर्शाता है की सच्ची वीरांगना को
निर्भीकता पूर्वक बुराइयो से मुकाबला करना चाहिए चौथा सूत्र है दूर दर्शिता वर्तमान की समझ
और अतीत से सीख लेने की प्रवृत्ति को अपनाना
माँ दुर्गा के शास्त्रों में त्रिशूल भी शामिल है
जिसके तीनो भाग भूत भविष्य और वर्तमान के द्योतक है
पांचवा सूत्र है अच्छे लोगो का साथ
माँ दुर्गा के साथ सभी दैवीय शक्तिया थी
उनके अग्र भाग में महावीर हनुमान और प्रष्ट भाग में भैरव देव रहते थे
जिसका तात्पर्य यह है की अच्छे और सत्पुरुषो से
निरंतर मार्ग दर्शन प्राप्त करना चाहिए
और ऐसे सत्पुरुषो के साथ रहने का परिणाम यह होता है
की कोई पीठ पीछे भी विश्वासघात नहीं कर पाता है
इसलिए दुर्गा उपासना के साथ-साथ
कोई नारी उपरोक्त सूत्रों का पालन करती है तो
माँ दुर्गा के सामान उसे बल की प्राप्ति होती है