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Thursday, March 21, 2013

मंत्र साधना और मनोरथ सिद्धि

भिन्न भिन्न मंत्र के प्रयोजन भिन्न होते है
भिन्न -भिन्न मंत्रो से वांछित मनोरथ की पूर्ति होती है
मनोरथ किसे कहते है मनोरथ अर्थात मन का रथ
मंत्र सिद्ध होने पर मन मे पलने वाले वाले
 संकल्प  स्वत साकार होने लगते है
सपने और  संकल्प वांछित आकार  ले लेते है
जो  लोग मंत्र साधना करते है
 वे गणना करते हुये निर्धारित संख्या मे मंत्रो को उच्चारण करते हुये
मनोरथ सिद्धि की कामना करते है
 परन्तु मंत्र के निहितार्थ को भूल जाते है
मात्र कण्ठ के माध्यम मे ध्वनि की निकल पाती  है
मंत्र के साथ मन का संकल्प नही रह पाता है कही छूट जाता है
परिणाम स्वरुप मन का रथ वांछित लक्ष्य की प्राप्ति की  ओर
   सही दिशा मे सही गति से नही चल पाता है
मनोरथ प्राप्ति का अभियान मंत्र साधना से 
अलग हट जाने के कारण अधुरा रह जाता है
साधक की ईष्ट और  मंत्र से आस्था हटने लगती है
ईष्ट और मन्त्र के साधक के बीच आत्मीय संपर्क
 होना अत्यंत आवश्यक है 
साधक की मन्त्र साधना के समय निष्काम भावना हो तो 
आत्मीयता ईष्ट से गहरी होती जाती है 
ईष्ट से आत्मीयता स्थापित होने पर ईष्ट से बिना मांगे ही 
सब कुछ मिलने लग जाता है 
हो सकता हमारी दृष्टि में  हमारी अपेक्षाए भिन्न हो 
परन्तु हमारे लिए क्या श्रेयस्कर है यह हमारे 
ईष्ट बहुत अच्छी तरह जानते है 
जिसका महत्व हमें बहुत समय बाद  ज्ञात होता है