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Sunday, March 30, 2014

धनवान नहीं सम्पन्न बनो

धनवान होना अलग बात है 
 सम्पन्न होना अलग बात है
धनवान के पास धन होता है 
परन्तु  धन के साथ मन हो साधन हो ,विचार हो
 योजना हो संकल्प हो आवश्यक नहीं 
धन से प्रत्येक वस्तु  मिल आवश्यक नहीं 
धन से ज्ञान ,यश रिश्ते 
नहीं ख़रीदे जा सकते 
धन के सहारे जो रिश्ते बनाये जाते है
 वे रिश्ते आत्मीयता विहीन और क्षण भंगुर होते है 
स्वार्थ उसकी बुनियाद होती है 
धन से चापलूसो कि फौज खड़ी कि जा सकती है 
प्रशंसको और हितेषियों कि नहीं
धन से चरित्र और स्वास्थ्य भी नहीं खरीदा जा सकता है 
अनेक अवसरों पर पर्याप्त धनवान व्यक्ति 
सद्व्यवहार के अभाव में अधिक 
धन देने को तत्पर होने के बावजूद
 वांछित वस्तु क्रय नहीं कर पाता 
और वांछित वस्तु ऐसे व्यक्ति को उपलब्धि हो जाती है
 जो सम्पन्न होता है 
सम्पन्नता कई प्रकार कि होती है 
वैचारिक ,चारित्रिक ,साधनो की ,भू सम्पदा ,
सामाजिक प्रतिष्ठा ,विश्वसनीयता से जुडी सपन्नताये
 महत्वपूर्ण होती है 
बहुत से ऐसे लोग होते है 
जिनके पास आत्मीयता और प्रेम कि सपन्नता 
प्रचुर मात्रा में होती है 
जिनके पास आत्मीयता और प्रेम कि  सम्पन्नता होती है 
उन्हें अपनों से से सहयोग प्राप्त होता है 
वह सहयोग जो बड़े -बड़े धनवान को भी 
दुर्लभ होता है इसलिए धनवान नहीं सम्पन्न बनो

Tuesday, March 25, 2014

शिव को नाग क्यों प्रिय है

भगवान् शिव को नाग क्यों प्रिय है 
नाग वह प्राणी है जो भीतर से जैसा होता है 
वैसा दिखाई देता है 
नाग के भीतर जहर होता है 
परन्तु वह अकारण किसी को नहीं डसता
नाग केवल उन्ही को डसता जो उस पर प्रहार करते है 
नाग भगवान् शिव को इसलिए भी प्रिय है क्योकि 
वह पूर्ण रूप से दंडवत मुद्रा में धरती के समतल चलता है 
ध्वनि के कम्पन से वह अपनी गति और दिशा तय कर लेता है 
भगवान् शिव को ऐसे व्यक्ति अत्यंत प्रिय होते है 
जो भीतर से जैसे हो बाहर से भी वैसे हो 
अकारण किसी पर प्रहार न करे 
आस्था रखे तो पूर्ण रूप दंडवत भाव से 
आस -पास वातावरण तथा खतरों के प्रति पूर्ण रूपेण 
संवेदनशील तथा सचेत हो
नाग कुंडली बना कर फन ऊंचा उठा लेता है
अल्प छिद्र में से प्रवेश कर मार्ग बना लेता है 
तात्पर्य यह है कि अव्यवस्थायों रोना रोने के बजाय 
व्यक्ति को समय के अनुसार अपने आप को ढाल लेना चाहिए 
कैसी भी विषम परिस्थिति हो मार्ग निकाल लेना चाहिए

Sunday, March 16, 2014

होली का पर्व

होली का पर्व अभिजात्य वर्ग का पर्व नहीं 
अभिजात्य मानसिकता त्याग कर 
सर्वहारा वर्ग का जीवन जी लेने का पर्व है 
ज्ञान ,धन ,वैभव का अहंकार त्याग करने का पर्व है 
विशेष व्यक्ति से सामान्य व्यक्ति बन जाने का यह उत्सव है 
व्यक्ति जब तरह -तरह के अहंकारो में बंध जाता है 
तो वह एक तरह कि कृत्रिमता का आवरण से घिर जाता है 
काल्पनिक छवि स्व यम कि गढ़ लेता है
 स्व यम में ही सारी विशेषता पाता है 
उसके लिए अपनी आलोचना सुनना सम्भव नहीं होती 
चाटुकारिता उसे अच्छी लगती है 
होली चाटुकारीता  प्रवृत्ति से मुक्ति पाने का अवसर है 
स्व यम के व्यक्तित्व कि वास्तविकता जानने का दिवस है 
अपनी जड़ो से जुड़ जाने सहज मस्ती अपनाने 
रंगो में मौसम कि उमस पाने का पर्व है 
हर प्रकार के रंग को आत्मसात कर लेने मे होली का आनंद है


Monday, March 10, 2014

रणछोड़ राय भगवान् श्रीकृष्ण

भगवान् श्रीकृष्ण को रणछोड़ राय के रूप में 
सम्बोधित किया जाता है 
भगवान् ने रण क्यों छोड़ा ?रण छोड़ राय क्यों बने ?
इन प्रश्नो के समाधान इतने सरल नहीं है
जीवन के यथार्थ में कब रणछोड़ बने ?
कब रण वीर बने ?
 यह महत्वपूर्ण होता है 
महत्वपूर्ण यह भी है कि विपक्षी के बल कि परख किये बिना 
हम रण में कूद जाए 
इसे वीरता नहीं मूर्खता कहा जाएगा 
भगवान् कृष्ण जानते थे कि 
जरा संघ कि विशाल सेना मथुरा को ध्वस्त कर देगी 
हजारो निरीह नागरिक मारे जायेगे 
इसलिए उन्होंने रण  को उन्होंने छोड़ दिया था 
उपयुक्त समय आने पर द्वंद्व युध्द में 
उन्होंने उसी पराक्रमी अजेय जरासंघ का वध 
 भीम के हाथो करवा दिया
कितनी लम्बी प्रतीक्षा पराक्रमी शत्रु को 
पराजित करने के लिए 
यह विचारणीय प्रश्न होनी चाहिए 
जीवन में समग्र विजय पाने के लिए शक्ति संचय के साथ 
सज्ज्न शक्ति के उदय कि आवश्यकता होती है 
जिसमे समय लगना स्वाभाविक होता है 
रण छोड़ बनने से लेकर जरासंघ के वध तक कि कथा 
भगवान् कृष्ण कि भूमिका इसी तथ्य को इंगित करती है 
इसलिए भगवान् श्रीकृष्ण रणछोड़ होने के बावजूद 
पराजय के प्रतीक के स्थान पर विजय के पर्याय रहे

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Monday, March 3, 2014

श्रीकृष्ण का सखा भाव

यह  सत्य है कि सज्जनों को किसी के भी प्रति 
विद्वेष का भाव नहीं रखना चाहिए 
परन्तु इसका यह तात्पर्य भी नहीं कि
 हम दुष्टो  कि दुष्टता को अनदेखा कर दे 
और सज्जनो को सज्जनता के लिए पुरस्कृत भी न करे 
ह्रदय में क्षमा भाव होना अच्छी बात है 
परन्तु क्षमा भाव को कोई हमारी कमजोरी ही समझ ले 
यह कतई उचित नहीं है 
यदि दुष्टो को समय रहते दण्डित नहीं किया गया 
तो उनकी दुष्टता और अधिक उग्र होती जावेगी 
इसी प्रकार से सज्जनता को पारितोषिक नहीं दिया गया तो 
समाज से सज्जनता लुप्त हो जावेगी 
समाज से सज्जनता लुप्त न हो 
इसलिए जहा भी अवसर मिले
 सज्जनो को सरंक्षण और प्रोत्साहन देना 
हमारा दैवीय दायित्व है
 कभी कभी सज्जन व्यक्ति इतना अधिक अकेला और असहाय 
हो जाता है कि उसका   मनोबल और सत्संकल्प 
टूट कर बिखर जाने कि स्थिति में होता है 
तब हमारा मात्र नैतिक समर्थन उसे नई ऊर्जा और जोश दे सकता है 
तब वह हम में श्रीकृष्ण  का सखा भाव  अनुभव करता है 
 इस पुनीत कार्य से हम  सहजता से देवत्व को प्राप्त कर लेते है 
देवत्व प्राप्त करते ही हमारे लघु प्रयास भी 
वृहद् लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु पर्याप्त होते है