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Wednesday, March 30, 2016

अंत

अंत में संत है महंत है पूर्ण विराम है
अंत में मृत्यु का सत्य है श्रींराम है
अंत में कथा का श्रवण वैकुण्ठधाम है
अंत में क्षीणता दुर्बलता बुढ़ापा है
अनुभव की गहराई है नभ् नापा है
अंत में वैराग है संन्यास है शोक है
शाश्वत और सनातन है श्लोक है
अंत में लक्ष्य है शिखर है सागर गहरा है
अनंत ब्रह्माण्ड के भीतर तम ठहरा है
अंत में कृष्ण गीता है रामायण है
कर्तव्य से विमुख क्यों ? समरांगण है
अंत में लय है प्रलय है ताण्डव है
नर में नारायण सत्य में पांडव है
अंत में नाद है निनाद है नृत्य उत्तम है
शिव का डमरू बजता डम डम है
इसलिए अंत से आरम्भ है
आरम्भ से अंत है
सृष्टि का बीज है बीज में बसंत है

Tuesday, March 29, 2016

आरम्भ और ऊँ

आरम्भ में ॐ है नम: शिवाय है
आरम्भ ही आदि अनादि भीमकाय है
आरम्भ में गंध स्पर्श झंकार है
भीगी हुई अनुभूतिया है निर्विकार है
आरम्भ में कठिनाईया है 
विघ्न है बाधा है
आरम्भ हो गया तो कार्य सफल हो गया आधा है
आरम्भिक अवस्था में
हर व्यक्ति सकुचाता है घबराता है
भय और संकोच के कारण आगे नहीं बढ़ पाता है
आरम्भ में उत्साह है रंग है तरंग है
होती विषम समस्याएं पर जीती जाती जंग है
आरम्भ में अर्पण तर्पण है समर्पण है
आरम्भिक प्रयासों से ही दिख जाता 
भावी का दर्पण है
इसलिए आरम्भ होना चाहिए
 उत्तम और भव्य है
उत्तम और सार्थक प्रयासों से 
मिल जाता गंतव्य है
आरम्भ में साधना है परिश्रम है 
तो जीवन योग है
तृप्त हो जाती सभी कामनाये
 मिल जाता आरोग्य है

Sunday, March 27, 2016

स्वास्थ्य लक्ष्मी और श्रीसूक्त

लोग माँ लक्ष्मी को मात्र धन प्रदान करने वाली देवी के रूप के में ही जानते है ऋग्वेद के श्रीसूक्त को धन ऐश्वर्य प्राप्त करने का माध्यम ही समझते है किसी का भी ध्यान अपने और अपने परिवार के स्वास्थ्य पर नहीं जाता जबकि स्वास्थ्य को धन से बड़ा धन माना जाता है आज हम श्रीसूक्त के उस मन्त्र की और आपका ध्यान आकृष्ट करायेगे जो लक्ष्मी जी से अच्छे स्वास्थ्य की कामना करता है श्री सूक्त मन्त्र क्रमांक जो इस प्रकार है 
" मनस: कामनाकूति वाच: सत्यमशीमहि 
पशूनां रूप मन्नस्य मयि श्री:श्रयतां यश :
अर्थात हे लक्ष्मी मैं आपके प्रभाव में मानसिक इच्छा एवं सकल्प वाणी की सत्यता गौ आदि पशुओं के रूप {दुग्ध दध्यादि एवं यव  बीहयादी }एवं अन्नो के रूप {अर्थात भक्ष्य भोज्य चोष्य लेह्य चतुर्विध भोज्य पदार्थ }इन सभी पदार्थो को प्राप्त करू ,सम्पत्ति और यश मुझमे आश्रय ले अर्थात मैं  लक्ष्मीवान और कीर्तिवान बनू । 
उपरोक्त मन्त्र में यह कामना की गई है की हे लक्ष्मी जी मुझे ऐसा स्वास्थ्य दीजिये की में सभी प्रकार के भोज्य पदार्थ ग्रहण कर सकु अर्थात चूसने चबाने खाने वाले वाले रस द्रव्य ठोस पदार्थो को दांतो से चबा सकु जिव्हा से रस लेते हुए उन्हें पचा सकु ।अप्रत्यक्ष रूप से उक्त मन्त्र से अच्छे स्वास्थ्य की कामना की गई है जिस व्यक्ति का स्वास्थ्य अच्छा होगा वह अच्छी पाचन तंत्र का होगा ही जिस व्यक्ति के हारमोन एंज़ाइम सक्रीय होंगे वह सभी प्रकार का आहार ग्रहण कर पायेगा ।लक्ष्मी जी इस स्वरूप को स्वास्थ्य लक्ष्मी संबोधित किया जाता है जिस व्यक्ति के स्वयं तथा परिवार का स्वास्थ्य अच्छा होता है वहा बीमारिया नहीं रहती ।बीमारिया दरिद्रता का कारण होती है ।बीमारियो से मुक्त व्यक्ति और परिवार होने से धन का अपव्यय नहीं होता है 

Thursday, March 24, 2016

सत्य की लड़ाई

सत्य की लड़ाई में
आदमी अकेला होता है
सूरज को कभी दीपक दिखाया नहीं जाता
जल का अर्पण किया जाता है
दीपक तो चन्द्रमा को दिखाया जाता है
अँधेरे को भागने के लिए
उजाला लाने के लिये
अँधेरे को दूर कर जो
जग में उजाला भर दे
उसे दिवाकर कहते है
दिवाकर की शरण में
सत्य दूत रहते है
अपराध अन्धकार की तलाश करता है
अँधेरे के भीतर गुप् चुप रहता है
उजाला जगमगाते ही खूब रोता है
अपना अस्तित्व खोता है
इसलिए अन्धकार मिटाने के लिए
सच का उजाला होता जरुरी है

Tuesday, March 22, 2016

मनुष्यता के मापदंड -३

गुण - मनुष्यता गुणों से विकसित होती हे सामान्य व्यक्ति गुण रहित होता हे उसे अवगुणी कहते है गुणों का मनुष्यता के लिए उतना ही महत्व हे जितना की अन्न ,जल , और स्वास  का अवगुणी व्यक्ति मात्र शरीर रूपी बोझ के अतिरिक्त और कुछ नहीं गुण शब्द व्यापकता लिए हुए हे उक्त बताए गुणों के साथ साथ और भी गुण हे जो व्यक्ति को श्रेष्ठ मनुष्य बनाते है कला संस्कृति, संगीत , नृत्य , अभिनय , विज्ञान , नाट्य , शिल्प भोजन-पाक कला  जैसे गुण मनुष्य को प्रकृति में विशेष स्थान देते है एकमात्र मनुष्य ही है जिसके पास चिंतन और कर्म करने की स्वतंत्रता यह गुण निहित है ।
धर्म  - धर्म से आशय मंदिर पूजा नियमों के निर्वहन से नहीं है नाही माला फेर देने से या दान- यज्ञ करना धर्म की शुद्ध परिभाषा  हे धर्म तो कर्म से प्रकृति - स्वभाव से संलग्न है जल का धर्म है शीतलता ,अग्नि का धर्म है दाहकता, वायु का धर्म है प्राण सतत बहना, पृथ्वी अपने धारण धर्म को निर्वहन करती है वृक्ष का अपना एक धर्म है प्रकृति में सभी का एक नियत धर्म है और उसी का ईमानदारी से निर्वहन करना कर्मयोग है जैसा कि गीता में भगवान ने स्पष्ट किया है ठीक इसी प्रकार व्यक्ति को मनुष्यता के मापदंड पर खरा उतरने के लिए अपने नियत धर्म का ईमानदारी से पालन करना चाहिए
उस धर्म को हम इस श्लोक से समझ सकते है-
"ईश्वर अंश जीव अविनाशी चेतन सरल सहज सुख राशि"
जीव ईश्वर का अंश हे वह अविनाशी हे अत: उसे सदैव इसी भाव मे रहना चाहिए वह चेतनता, सरलता और सभी के लिए सदैव सुख का माध्यम बनकर रहना यही उसका धर्म है
" येषा न: विद्या न: तपो न: दानं  न ज्ञानं न: शीलं न: गुणों न: धर्म ते  मृत्युलोके भार भवति: मनुष्य रूपेण: पशु चरंति"

मनुष्यता के मापदंड -२

ज्ञान - विद्या और ज्ञान यह दोनों भले ही एक लगे परन्तु यह दोनों है अलग - अलग यह अवश्य हे कि यह दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हे परस्पर जुड़े हुए पर एक नही
विद्या को प्राप्त किया जाता है और ज्ञान का उपयोग विद्या का परिणाम ज्ञान हे दोनों में बहुत सूक्ष्म भेद हे ज्ञान व्यक्ति को मनुष्य बनाने वाली वह शक्ति हे जिसके उपयोग से मनुष्य स्वयं अपना और विश्व का कल्याण करने का सामर्थ्य रखता हे विद्या ग्रहण कर उससे उत्पन्न ज्ञान का उपयोग कर मनुष्य बहुत सकारात्मक प्रभाव पैदा कर सकता हे जो मनुष्यता को नई ऊँचाईया  देने मे सक्षम है
शील - इस एक ही शब्द में दो गुणों का सामूहिक समावेश है  पहला है चरित्र यह वह गुण है जो व्यक्ति को मात्र मनुष्य ही नही एक श्रेष्ठ मनुष्य बनाता हे चरित्र ही मनुष्य की संचित एकमात्र सम्पति हे जो यद्दपि भौतिक सुख नही क्रय कर सकती परन्तु  व्यक्ति को हजारों धुली - कणों के मध्य प्रकाशित रत्न के रूप में आलोकित करने में सक्षम हे चरित्र से मनुष्यता आती हे यह व्यक्ति को वह शक्ति देता हे जो उसे विकट परिस्थितियों मे भी विचलित नहीं होने देता
दूसरा हे विनम्रता यह मनुष्य का आभूषण हे विनम्रता से मनुष्य लोकपूजक बन जाता है अहंकार मनुष्य का क्षत्रु हे विनम्रता से अहंकार का नाश हो जाता हे और मनुष्य सदैव के लिए आत्मशातिं  (inner peace)
को प्राप्त हो जाता है
                                            शेष .........

Monday, March 21, 2016

होली

होली एक पर्व नहीं
सामाजिक क्रान्ति है
सामाजिक क्रान्ति जो आर्थिक
असमानता को दूर कर करे
सामाजिक क्रान्ति जो जातीयता के
दानव का दहन कर दे
होली एक आंदोलन है
आंदोलन जो सत्य को ग्रहण करे
असत्य को त्यागने को
अहम् के हिरण्यकश्यप का हनन करे
होली एक क्रीड़ा है े
क्रीड़ा वह जो मन की पीड़ा का शमन करे
होली एक अनुभव है आत्मीयता का
आत्मीयता जो मन को आल्हाद दे
आधुनिक प्रह्लाद का सरंक्षण करे
होली एक पिपासा है
पिपासा जो प्रेम का  वरण करे
ईर्ष्या और घृणा का क्षरण करे

Saturday, March 19, 2016

मनुष्यता के मापदंड

कोई भी व्यक्ति तब तक मनुष्य कहलाने योग्य नहीं होता जब तक उसमें शास्त्रों में बताए गये सात गुणों का अभाव हो वह सात गुण है
विद्या - विद्या से आशय किताबी ज्ञान , डिग्रीयों के बडंल या रटंत विद्या से नहीं अपितु उस विद्या से है जो व्यक्ति के चरित्र का निर्माण करने वाली हो उसे सत-असत का बोध कराती हो उसे राष्ट्र -समाज का आदर्श नागरिक बनाती हो जो उसे अपने ही परिवार  का उत्तम सदस्य बनाती हो सारत: विद्या वह है जो व्यक्ति को मनुष्य बनाती हो
तप - दूसरा गुण है तप यहाँ तप से मतलब हिमालय कि किसी कन्दरा या गहन वन मे एक टांग पर खड़े होकर किये जाने वाले तप से नहीं हे अपितु मनुष्य द्वारा समाज जीवन में किये गए उसके पुरुषार्थ से है पुरुषार्थी पुरूष का हर कर्म स्वत: में ही तप हे चाहे वो कर्म  राष्ट्र के लिए हो समाज के लिए अथवा परिवार  की उन्नति के लिए किया गया हो  पुरुषार्थी व्यक्ति का हर कर्म तप ही होता हे बस उसमें  "में " की भावना का का पूर्ण रूप से अभाव होना चाहिए
दान - किसी भिखारी को जेब में शेष रह गयी रेंजगारी दे देना अथवा पुण्य के स्वार्थ में किया गया कोई एेसा दान जो सतही हो दान नही है , प्रतिकर  की  भावना से किया गया दान दान हो ही नहीं सकता
दान की परिभाषा तो बहुत व्यापक होती है दान का महत्व तभी है जब दाता को उस सम्बधित दान की उतनी ही अधिक आवश्यकता हो जितनी की दान लेने वाले को हे सारत: दान वह है जो प्रतिकर ,स्वार्थ रहित हो तथा जो दाता के लिए उतना ही महत्व रखता हो जितना की वह अदाता के लिए महत्वपूर्ण है  जो स्वयं कष्ट पाकर भी परहित के लिए किया गया हो वही दान व्यक्ति को मनुष्य बनाती है
                                               शेष भाग .........

Friday, March 18, 2016

चिंतन क्या है ?

चिंतन चित का विश्राम  है
मन की तृष्णाओं का होता विराम है 
चिंतन सृजन का स्त्रोत है 
निर्माण की चेतना है 
चिंतन दुस्साहस नहीं साहस है 
अध्यात्म की ऊर्जा है 
खुल जाते है पंच कोष 
जुड़ जाते है सद विचार 
विस्फुरित होती कुण्डलिनी
खुल जाता पुर्जा पुर्जा है
चिंतन चिंता का करता हरण  है 
मिट जाते है सभी विकार 
 अनाहद के भीतर होता अमृत तत्व
तरल अमृत का होता निरंतर झरण  है
चिंता में होती वेदना है 
चिंतन से जगती  संवेदना है
चिंतन का वरदान उसी को मिलता है 
जिसके चित्त सरोवर में 
ह्रदय का कमल खिलता है 
चिंतन मोक्ष दायिनी गंगा 
पुण्य सलिला मैया नर्मदा है 
मिल जाती है कष्टो से मुक्ति 
आनंदित रहते सर्वदा है 
इसलिए चिंतन उसी को मिला है 
जो भगवद  सत्ता के समीप है 
जप तप  का लंबा सिल सिला है
चिंतन एक भगत  की भक्ति है 
साधक की शक्ति है 
चिंतन के रथ पर होकर सवार 
जीवन के  कर्म क्षेत्र से हर युक्ति मिल सकती है 
चिंतन वासना का विराम है 
किंकर्तव्य विमूढ़ मन का घनश्याम है 


Wednesday, March 16, 2016

सीमित विश्वास और जीवन प्रबंधन

विश्वास करना या न करना 
व्यक्ति व्यक्ति पर निर्भर करता है 
परन्तु किसी पर एकदम से 
 अविश्वास कर लेना 
और हर किसी पर विश्वास करना 
भी उचित नहीं है 
जो व्यक्ति हर किसी पर
 जरुरत से अधिक विश्वास कर लेता है
 विश्वास घात उसी व्यक्ति के साथ होता है
 और जो व्यक्ति किसी पर भी
 विश्वास नहीं करता 
वह सदा संशयग्रस्त रहता है 
जीवन में व्यवहारिक दृष्टि से असफल रहते है
एक बहुत पुरानी कहावत है 
सीमित संपर्क ,सीमित विश्वास, 
सर्वोपरि आत्मविश्वास ,
सीमित विश्वास का तात्पर्य यह है कि
 किसी कार्य के लिए कौनसा व्यक्ति उपयुक्त है
 यह निर्धारित करने के बाद
 किसी व्यक्ति की कार्य क्षमता 
और उसके व्यक्तिगत गुणों का आकलन कर 
उस पर विश्वास करना 
जीवन प्रबंधन का यही सर्वश्रेष्ठ मार्ग है 
इसी मार्ग से समूह का नेतृत्व कर 
दक्षता पूर्वक समूह के
 प्रत्येक सदस्य से कार्य लिया जा सकता है

Saturday, March 12, 2016

गति एवम् उपासना

गतिशीलता जीवन का पर्याय है
गति में प्राण में है
जो गतिमान नहीं है वह निश्चेत है
नदी गतिशील है तो निर्मल है
गतिशील नदी में जल परिशोधन की क्षमता है
स्थिर होने पर नदी का जल प्रदूषित है
इसी प्रकार से बहती वायु में ताजगी है
मंद या स्थिर वायु में बैचेनी है घबराहट है
विचार शून्यता व्यक्ति को चिंता प्रदान करती है
नवीन विचारो का सृजन जीवन को
नई दिशा और ऊर्जा प्रदान करते है
विज्ञान ने गति के कई नियम
और सिध्दांत प्रतिपादित किये
गति के स्त्रोत का अनुसंधान करने हेतु  तत्वों को
अणु परमाणु इलेक्ट्रान प्रोटान न्युट्रान में
विभाजित किया
परन्तु इलेक्ट्रान प्रोटान को ऋण आवेशित
और धन आवेशित ऊर्जा
कहा से निरन्तर प्राप्त हो रही है
इस पहेली को सुलझा नहीं पाये
प्राचीन ऋषि महर्षियो ने गति के
ऊर्जा के स्त्रोत को अध्यात्म में खोजा
साधना के बल पर उन्हें प्राप्त करने की
प्रक्रियाएं बताई ।उन्ही प्रक्रियाओ में से
शक्ति की उपासना महत्वपूर्ण है
नवरात्रि में इसलिए जीवन में
ऊर्जा भरने के लिए
गति की उपासना की जाती है
क्रिया के तीनो रूपों के स्त्रोत एवम्
प्रेरक शक्तियो से चैतन्यता प्राप्त की जाती है

लोकतंत्र से राजतंत्र तक

सत्ता  के शीर्ष से
 अव्यवस्था दिखाई नहीं देती है
सत्ता के आस पास जो आभा मंडल होता है
वह शासक को वास्तविकता देखने ही नहीं देता है
सत्ता पर बैठते ही व्यक्ति पर 
अहंकार सवार हो जाता है
बहुत से सत्ताधीशो को देखा है 
जो किसी जमाने में जिन मुद्दो के लिए संघर्ष रत थे
सत्ता के शीर्ष पर बैठते ही 
उनकी प्राथमिकताएं बदल गई
सत्ता शोषण का प्रतीक तब बन जाती है
 जब शासक निज सुखो को 
अधिक महत्व देने लगता है
प्राचीनकाल में अच्छे शासक वेश बदल कर जनता के बीच उनके सुख दुःख देखने चले जाते थे
वर्तमान में सुरक्षा  चक्र के नाम पर 
शासक जनता से दूर हो चुके है
निर्वाचित होते ही जनता की 
समस्याओ से पूरी तरह कट जाते है
क्षुद्र और निहित स्वार्थ साधना में लिप्त हो जाते है
उच्च शब्दावलियों में लम्बे व्याख्यान 
भ्रांतिपूर्ण नारेबाजी में उलझकर कोई भी 
लोकतांत्रिक प्रक्रिया से निर्वाचित नेता 
खुशामदी किस्म के व्यक्तियों के 
पाखंडपूर्ण महिमामंडन से गौरवान्वित हो
 आत्ममुग्ध हो जाता है 
और यही से उसके पतन की शुरुआत होती है 
 

Tuesday, March 8, 2016

आदि शंकराचार्य और मंडन मिश्र

 
आदि शंकराचार्य शिव के अंश माने जाते है |
जब देश कई प्रकार के अंध विश्वासो 
कर्म कांडो से घिरा हुआ था |
वैदिक ज्ञान लुप्त होने लगा था |
 ब्राह्मण वर्ग स्वयं को श्रेष्ठ और शास्त्रो के ज्ञाता समझने लगा  था  |
शास्त्रो के अर्थ अपने स्वार्थ के अनुरूप निकाल कर धर्म को शोषण का साधन बनाने लगे था  |
तब आदि शंकराचार्य के रूप में 
भारतीय आध्यात्मिक क्षितिज पर 
एक ऐसा महापुरुष पाया |
जिन्होंने सनातन वैदिक संस्कृति को 
जीवन दान दिया |
धर्म को सभी प्रकार के आग्रहों से मुक्त किया 
विशुध्द वैदिक मार्ग समाज को बताया |
                तत्कालीन समय में शास्त्रार्थ के द्वारा पाखण्ड और गलत परम्पराओ से 
मुक्त करने हेतु 
उन्होंने काशी के महत्वपूर्ण विद्वानों को 
 पराजित कर उन्हें अपना अनुयायी बनाया |
 सम्पूर्ण देश में अपनी धर्म ध्वजा को 
फहराने के बाद जब देश में एक मात्र विद्वान पंडित मंडन मिश्र शेष रहे |
तब आदि शंकराचार्य 
मंडन मिश्र की नगरी मंडलेश्वर पहुचे 
और उन्हें अपने अकाट्य तर्कों से परास्त किया |
मंडन मिश्र की भार्या द्वारा 
शास्त्रार्थ की चुनोती देने पर 
उन्होंने गृहस्थाश्रम संबंधी प्रश्नो के 
जबाब देने के लिए परकाया प्रवेश का मार्ग अपनाया |गृहस्थाश्रम का ज्ञान लेकर 
पुनः निज शरीर में प्राण प्रविष्ठ कर 
गृहस्थाश्रम के सभी प्रश्नो के जबाब दिए |
आज भी मंडलेश्वर में गुप्तेश्वर नामक शिव मंदिर स्थित है |
जहाँ आदि शंकराचार्य ने गृहस्थाश्रम 
संबंधी प्रश्नो के उत्तर देने के लिए 
परकाया प्रवेश हेतु निज देह से प्राण निकाले 
और पुनः प्रविष्ठ किये थे |
वीडियो में दर्शित स्थल उन पलो का साक्षी है जो 
गुप्तेश्वर महादेव के नाम से 
मण्डलेश्वर नगर में जाना और पहचाना जाता है |  

Monday, March 7, 2016

शिवरात्रि

भारतीय संस्कृति में
 वैराग्य का अत्यंत महत्व है
वैराग्य में वह बल है 
जो अनंत आकाश में निहित 
 शिव सत्ता तक पहुंचा सकता है
शिव क्या है ?
शिव वैराग्य के प्रतीक है 
पार्वती क्या है ?
पार्वती समर्पण का भाव है 
शिवरात्रि वह पर्व है
 जो वैराग्य को अपने सारे सुख
 समर्पित कर दे वह उत्सव है
शिवरात्रि पर पार्वती संग शिव ने विवाह रचाया था 
पार्वती रूपी समर्पण ने सुख अपने अर्पित कर
 कठोर तप  से वैराग्य को पाया था 
वैराग्य शिव तत्त्व की नीव है 
भोग में रोग है 
अभिलाषा में प्राप्ति में है 
प्राप्ति में कहा सुख है 
प्राप्ति में रहा दुःख है 
,प्राप्ति से परमात्मा विमुख है 
इसलिए शिव को पाना है 
तो जीवन में वैराग्य को लाओ 
सेवा समर्पण के अलंकृत हो 
शिवरात्रि पर्व पर 
आत्म बल का जागरण करते जाओ 



Saturday, March 5, 2016

अकर्मण्ये साधिकारस्ते माँ फलेषु कदाचन

कर्मशील लोग कर्म को पूजा मानते है 
परन्तु अकर्मण्य और निकम्मे लोग 
कर्म को शर्म का विषय मानते है
कोई सा भी काम उनको दे दो 
उन्हें लगता है 
वे जिस काम के लिए बने 
वो यह काम नहीं है जो उन्हें दिया गया है
 जिस काम को करने के लिए 
उनका इस जगत में आविर्भाव प्रादुर्भाव हुआ है 
वह एक विशेष और अद्भुत कार्य है
 जिसके लिए ईश्वर ने उनका चयन किया है 
इसलिए वे दूसरा काम क्यों करे? 
छोटे मोठे काम करने में उन्हें संकोच होता है 
छोटेपन का अहसास होता है 
उनका संकल्प है कि
 वे जब भी कोई काम करेंगे, बड़ा काम करेंगे
 उनके काम से उन्हें पहचाना जाएगा 
तब लोगो को पता चलेगा कि 
यह बड़े काम का आदमी है 
ऐसी सोच के बल पर वे कितने ही 
छोटे छोटे कामो को करने से बच जाते है 
और अपने इस आदर्श वाक्य का 
कि " अकर्मण्ये साधिकारस्ते माँ फलेषु कदाचन "
को चरितार्थ कर 
स्वयं को कृतार्थ समझते है
इसी विचार धारा से प्रेरित हो 
उन्होंने कितनी हाथ में आई
 छोटी छोटी नोकरिया छोड़ दी उन्होंने 
यह अतिशयोक्ति नहीं होगी लात मार दी 
उन्होंने ऐसी नोकरिया जो 
उन्हें छोटेपन का अहसास दिलाती थी
बड़े बड़े विषयो पर लंबे लंबे व्याख्यान 
चर्चाये परिचर्चाएं में जो उन्हें सुख मिलता है 
वे बड़प्पन के अहसास से भरपूर है 
बहुत अच्छा लगता है
 उन्हें यह सुनकर कि 
अपने देश इस प्रतिभा का कोई पारखी नहीं
 इसलिए प्रतिभाये विदेश पलायन कर रही है