व्यक्ति महिला हो या पुरुष हो
अकारण आक्षेप लगने अपमानित हो जाता है
व्यक्ति के आत्मसम्मान का मुल्य
उसकी सम्पन्नता से नहीं आंका जा सकता
बहुत से ऐसे व्यक्ति समाज में विद्यमान है
जो अत्यधिक समृध्द होने के बावजूद
स्वाभिमान शून्य और आत्मसम्मान की
भावना से विहीन है इसके विपरीत
बहुत से दरिद्रता पूर्ण परिस्थितियों में जीवन यापन
करने वाले व्यक्ति आत्मसम्मान के लिए
जीवन तक न्यौछावर कर देते है
करने वाले व्यक्ति आत्मसम्मान के लिए
जीवन तक न्यौछावर कर देते है
आत्मसम्मान को आघात पहुचने पर
या तो वे किसी भी सीमा तक पहुचने से नहीं चुकते
इतिहास में अनेक ऐसी महिलाए हुई है
जिन्होंने आत्मसम्मान के लिए जौहर किया
चित्तोड गढ में विजय स्तम्भ के समीप
स्थल इस तथ्य का साक्षी है
जहाँ रानी पद्मिनी ने सैकड़ो अन्य महिलाओं के साथ
अपनी अस्मिता को बचाने के लिए
अग्नि शिखा में कूदकर जौहर किया था
त्रेतायुग में देवी अहिल्या जो गौतम ऋषि की भार्या थी
इंद्र के द्वारा छल से शील भंग किये जाने से
शापित हुई कहा जाता है की वह
पाषाण का रूप धारण कर चुकी थी
जिनका उध्दार मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम ने किया था
यहाँ पाषाण वत होने का आशय समझना होगा
क्या वास्तव में अहिल्या पत्थर बन चुकी थी
पत्थर तो प्रतीक है
जिस व्यक्ति में संवेदना का भाव समाप्त होता है
भाव विहीन हो जाता है
उसे पत्थर दिल ही कहा जाता
अहिल्या जो आत्मसमान से युक्त महिला थी
छल से अपनी अस्मिता खो देने के बाद
पति गौतम ऋषि द्वारा परित्यक्त की जा चुकी थी
अकारण उपेक्षा और अपमान के कारण
अपनी सुध-बुध खो चुकी थी
संवेदनाये खो कर भाव विहीन अर्थात
पाषाण वत हो चुकी थी
भगवान् राम जो युग पुरुष थे के द्वारा ऐसी महिला के प्रति
सहानुभूति प्रकट किये जाने पर
और सम्मान प्रकट किये जाने पर
आत्मविश्वास पाकर मानवीय संवेदना से परिपूर्ण चुकी थी
इसलिए कहते है देवी अहिल्या का श्रीराम द्वारा उध्दार किया गया था
वर्तमान में अकारण अपनी अस्मिता खो देने वाली
अह्ल्याये जो पाषाण वत हो चुकी है
के उध्दार हेतु मर्यादा पुरुषोत्तम की भूमिका कोई
निभाने वाला है या नहीं यह ज्वलंत प्रश्न हमारे सामने उपस्थित है

