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Thursday, May 16, 2019

मानसिक नपुंसकता

दुष्ट कितना भी शक्तिशाली हो वीर उनका सामना कर उन्हें परास्त कर दंड देते है विद्वानों गुणवानों का सम्मान करते है कमजोरो को अभयदान देते है विपत्ति ग्रस्त लोगों को सहयोग करते है वीरता कप यह भाव लुप्त होता जा रहा है वीरता के भाव के स्थान पर मानसिक नपुंसकता अधिक मात्रा में व्याप्त होने लगी है
                मानसिक नपुंसकता पारिवारिक सामाजिक प्रशासनिक राजनैतिक स्तरों पर पाई जाने लगी है  मानसिक रूप से नपुंसक्त व्यक्ति प्रभावशाली और शक्तिशाली दुष्ट व्यक्तियों से दुष्प्रभावित होकर उन्हें सुविधाएं और अवसर प्रदान करते है कमजोर व्यक्तियों का शोषण करते है और विपत्ति ग्रस्त व्यक्तियों की सहायता से मुख मोड़ते है इस प्रकार मानसिक नपुंसकता से ग्रस्त व्यक्ति हमारे समाज परिवार और प्रशासन को खोखला कर रहे हैं मानसिक रूप से नपुंसकता स्तर स्थानीय  से लगा कर अंतरराष्ट्रीय हो सकता है अंतरराष्ट्रीय  स्तर की नपुंसकता दुर्बल राष्ट्र का दमन करती है

Monday, April 22, 2019

शरीर से अशरीर की यात्रा

शरीर से अशरीर की यात्रा अध्यात्म का मार्ग है आत्मा से जुड़ी अनुभूतिया जितनी प्रखर होगी आध्यात्मिक गहराईयां उतनी गहरी होती जाती है व्यक्ति जब तक जीवित रहता है उसकी अनुभूतिया इन्द्रियों से जुड़ी रहती है परंतु व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात के शरीर का अंतिम संस्कार हो जाता है इंद्रिया नष्ट हो जाती है आत्मा शेष रहती आत्मानुभूतिया बची रहती है आत्म बल शेष रहता है आत्म ज्ञान शेष रहता है आत्मा से जुड़े संस्कार और विचार शेष रहते है इसलिए व्यक्ति के लिए यह अनिवार्य हो जाता है कि वह जीवित रहते वह आत्मा ऐसा कार्य करे कि उसके आत्म बल आत्म ज्ञान में वृध्दि हो प्राणों की सिध्दि हो

Saturday, April 6, 2019

बेटी में सपना साकार रहा

न मानव के अधिकार रहे

न करुणा पावन प्यार रहा

मानव मानव से दुखी रहा

और हृदयविहीन व्यापार रहा

मन के भीतर न ख़ुशी रही

नहीं खुशिया का श्रृंगार रहा

आंसू अविरल है नयन बहे

सुख सपनो का संसार ढहा

दुःख से धरती माँ सिसक रही

जन अपमानित मन चीत्कार रहा

दीन दुर्बल को यहाँ चुन चुन कर

शव क्षत विक्षत होता संहार रहा

हम दिवस मनाते अधिकारो के

हर पल हमको धिक्कार रहा

बीता जीवन अंधियारे में

और उजियारा उनके द्वार रहा

ढोता बचपन है बस्तों को

नाजुक कंधो पर भार रहा

बेटो में वत्सलता बाँट रहे

बेटी में सपना साकार रहा 


Wednesday, April 3, 2019

भाग्यशाली

परिवार के सदस्य होना अलग बात है 
और आत्मीय होना अलग बात है 
आत्मीय वे होते है
 जो अपनों के ह्रदय की भावनाओ को समझ सके 
वे नहीं जिनके समक्ष हम अपनी भावनाये प्रकट ही न कर सके 
वर्तमान में कई परिवार ऐसे दृष्टिगत होते है
 जहां एक व्यक्ति अपने हृदय की बात नहीं कह सकता
विशेषकर परिवार के उस  सदस्य के सामने 
जो नकारात्मक वृत्तियों  से भरा हुआ हो 
ऐसा व्यक्ति तरह तरह के दुराग्रह 
और पूर्वाग्रह के रहते किसी की नहीं सुनता है 
अपने द्वारा गढ़ी  हुई मिथ्या धारणाओं के समक्ष
 हर तथ्य को असत्य मानता है 
ऐसा व्यक्ति परिवार मे होकर भी बेगाना होता है 
वही कुछ लोग परिवार के सदस्य न होकर भी आत्मीय होते है 
शब्दों से परे वे ह्रदय की हर पीड़ा को समझते है 
वे लोग बहुत भाग्य शाली होते है 
जिन्हे अपने परिवार में ही आत्मीय जन पाए है  


Monday, March 11, 2019

गहना तो बहना है

भावो की मृदुलता उसने यहाँ पाई है

गहना तो बहना है बहना का भाई है

रिश्ता एक प्यारा है आँखों तारा है

राखी पे बहना की चिठ्ठी एक आई है

रौनक है वह घर की खुशियो सी आई है

दुःख दर्द गहरे है फिर भी मुस्काई है

सब कुछ ही सहना है दुखियारी बहना है

राखी पर बहना की आँखे छलक आई है

Tuesday, January 15, 2019

संक्रांति

संघर्ष जीवन की नियति है संघर्ष के बिना सफलता की कल्पना नही की जा सकती है इस दुनिया मे ऐसा कोई व्यक्ति नही जिसने जीवन मे दुख नही देखा है लेकिन इतिहास उसी का बनता है जिसने दुख देखने के बाद संघर्ष करके सफलता पाई है दुख से कातर व्यक्ति किसी व्यक्ति की करुणा सहानुभूति पा सकता है पर यही करुणा सहानुभूति उस व्यक्ति को कमजोर बना देती है इसलिए आवश्यकता से अधिक सहानुभूति व्यक्ति मानसिक रूप से अशक्त बना देती है धीरे धीरे वह दूसरे की दया पर आश्रित हो जाता है संघर्ष शील व्यक्ति सफलता प्राप्त नही होती तब तक निरन्तर कर्मरत रहता है संघर्ष के पथ पर एक मुकाम ऐसा आता जब व्यक्ति विचलित होने लग जाता है लक्ष्य समीप हो तो ऐसा विचलन अधिक मात्रा में होने लगता है तब व्यक्ति की धैर्य की परीक्षा होने लगती है उस परिस्थिति में जिस  व्यक्ति ने धैर्य नही खोया वह ही विजेता कहलाता है मंतव्य से गंतव्य की यात्रा के क्षण अत्यधिक महत्वपूर्ण होते है इसी यात्रा को हम संघर्ष यात्रा या संक्रमण का दौर कह सकते है यह हमारे जीवन के परिवर्तन का दौर मौन क्रांति का परिचायक होता है इसे ही हम संक्रांति के नाम से संबोधित कर सकते है संक्रांति अर्थात सकारात्म दिशा में परिवर्तन
इसलिए हम परिस्थितियों में आक्रांत नही स्वस्फूर्त ऊर्जा से भरपूर रहे संक्रांत रहे । यह सक्रांति का भाव ही हमारे उत्थान करेगा

Monday, December 24, 2018

कर्म पलायन नही उत्तदायित्व है

धर्म वह जो कर्म को प्रखर कर दे
धर्म वह नही जो कर्म की गति को मंथर कर दे
वास्तव में धार्मिक होना और धार्मिक दिखना
अलग अलग बात है
धार्मिक होने और धार्मिक दिखने दोनों में अंतर है
जरूरी नही की जो मंदिर मस्जिद या गुरुद्वारा जाए
वह धार्मिक है धार्मिक वह भी हो सकता है
जो बिना किसी धर्म स्थल जाए शुभ कर्मों को धारण करता हो ।
कर्म ही चेतना है कर्म है जीवन है
जो कर्म से विमुख हो जो धर्म के नाम पर
दायित्व से पलायन करते है वे धार्मिक नही है
धर्म पलायन नही उत्तदायित्व की अनुभूति है