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Tuesday, February 28, 2017

माँ अंजनी

जबलपुर भेड़ाघाट रोड पर स्थित माँ अंजनी की अत्यंत प्राचीन प्रतिमा है कहा जाता है कि इस स्थान पर माता अंजनी निवास करती थी इस स्थान के पास ही वह स्थल विद्यमान है जहाँ पुष्पक विमान उस समय उतरा था जब भगवान् राम लक्ष्मण हनुमान सहित अयोध्या के लिए प्रस्थान कर रहे थे और कुछ देर माता अंजनी से मिलने के लिए रुके थे विमान उतरने के स्थल पर गोलाकार गढ्ढा स्पष्ट दिखाई देता है जिसमे वर्तमान में कमल और कमलिनी के पुष्प जल में खिलते हुए दिखाई देते है

Sunday, January 8, 2017

सत पुरुष और सद्गुरु

जैसे ईश्वर से साक्षात्कार
सद्गुरु ही करा सकता है
वैसे ही सद्गुरु का साक्षात्कार
सत्पुरुष ही करा सकता है
सत्पुरुष के लक्षण क्या है?
सब जानते है परंतु व्यक्ति के बाह्य रूप से
सत्पुरुष की  पहचान नहीं की जा सकती है
सत्पुरुष की पहचान  क्या है?
जैसे लोह धातु का चुम्बक अपने सामान
गुणों से युक्त चुम्बक को आकर्षित कर लेता है
उसी प्रकार सत्पुरुष व्यक्ति को आकृष्ट
सत्पुरुष ही कर सकता है
सत पुरुष में सतगुण की वे तरंगे होती है
जिससे सतगुण से युक्त व्यक्ति
स्वतः खींचे चले आते है
यदि किसी व्यक्ति के बाह्य रूप से
सज्जनता परिलक्षित होती हो
परन्तु वह दुर्गुणों और व्यसनों से युक्त
व्यक्तियों से घिरा हो
उसको उन्ही लोगो में अच्छा लगता हो तो
यकीन मानिए वह व्यक्ति सत्पुरुष नहीं है
मात्र उसने सज्जनता का आवरण ओढ़ रखा है

Friday, January 6, 2017

चरित्र

व्यक्ति की पहचान उसके व्यक्तित्व से होती है
व्यक्ति का व्यक्तित्व उसकी आदतों से बनता है
अच्छी आदतें व्यक्ति को चरित्रवान
और बुरी आदतें व्यक्ति को दुश्चरित्र बना देती है
व्यक्ति के दुश्चरित्र की कीमत
उसके परिवार समाज
और कभी कभी राष्ट्र को चुकाना पड़ती है
जबकि चरित्रवान व्यक्ति परिवार समाज
और समाज को अपने चरित्र को उपकृत करता है
उसे सच्चरित्र होने की कीमत पग पग पर
चुकाना पड़ती है चरित्र की पवित्रता
व्यक्ति को मर्यादित रखती है
इसलिए वह पथ भृष्ट नहीं हो पाता
चारित्रवान व्यक्ति जिस पर अग्रसर होता है
वह पथ उसके पग से सुशोभित होता है
जिस गंतव्य की और प्रस्थान करता है
वह गंतव्य गरिमा प्राप्त करता है
जिस पद को प्राप्त करता है
वह पद उत्कृष्ट व्यक्ति के कृतित्व से
धन्य हो जाता है

Saturday, December 3, 2016

बुरा जो देखन मैं चला

कबीर दास जी के  दोहे की
 यह पंक्ति बहुत से संत दोहराते है कि
 "बुरा जो देखन जो चला मुझसे बुरा न कोय "
ऐसा कह कर व्यक्ति को
 आत्म आलोचना करने हेतु प्रेरित करते है 
परन्तु व्यवहारिक जगत में
 वास्तव में ऐसा नहीं होता 
कुछ लोग जो मूलतः अपने स्वभाव से बुरे होते है
 वे अकारण ही अच्छे लोगो को हानि पहुचाते रहते है
 हम कभी कभी यह सोचने का 
तलाशने का बहुत प्रयास करते है
कि  जाने अनजाने हमसे ऐसी कौनसी त्रुटि हो गई 
जो सामने वाला व्यक्ति हमारा अहित चाहता है 
कारण तलाशने पर भी पता नहीं चलता 
यदि यह दोहा वर्तमान परिस्थितियो में 
सार्थक होता तो हम अच्छे और बुरे लोगो में 
कोई भेद ही नहीं कर सकते 
हम कोई भी क्षति होने पर 
बुराई की पहचान न कर 
मात्र आत्म विश्लेषण कर लेते ऐसा कर हम बुरे व्यक्तियों को बुरे कर्मो से विमुख न कर 
उन्हें और अधिक स्वच्छंद और उच्छृंखल ही बनाते रहेगे और स्वयम संत्रास झेलते रहेंगे
कबीर दास का यह दोहा 
वर्तमान परिस्थितियों के लिए 
अधिक प्रासंगिक नहीं रहा है 
कबीर दास जी ने इस दोहे की जब रचना की थी
 तब कि परिस्थितियां भिन्न थी 
लोग अकारण भले व्यक्तियों को संत्रास नहीं देते थे परन्तु वर्तमान में ऐसे लोगो की बहुतायत है
 जो अकारण दूसरे व्यक्तियों को क्षुद्र स्वार्थो की पूर्ति हेतु संत्रस्त करते रहते है
 तब भले व्यक्तियों के लिए यह कहना कि 
"बुरा जो देखन मैं चला मुझसे बुरा न कोय"
 उचित प्रतीत नहीं होता है

Sunday, November 6, 2016

राक्षस भगवान् विष्णु की तपस्या क्यों नहीं करते थे?

प्राचीन काल में राक्षस ब्रह्म देव और महादेव शिव की तपस्या कर शक्ति और अमरता का वरदान प्राप्त कर लेते थे \शक्तियों का दुरूपयोग कर संसार में अत्याचार कर आतंक फैलाते है ऐसे दैत्यों का दमन करने के लिए भगवान् विष्णु अवतार धारण करते थे |विचारणीय प्रश्न यह है कि आखिर दैत्य राक्षस भगवान् विष्णु की तपस्या कर वरदान क्यों प्राप्त नहीं करते थे ।इस संबंध में यह कहना उचित होगा कि भगवान विष्णु सृष्टि के पालन कर्ता है | किसी भी व्यक्ति या कृति निर्माण या ध्वंस करना आसान होता है| उसका सरंक्षण संपोषण संवर्धन कठिन होता है ,इसलिए वे अपने दायित्व अनुरूप सृष्टि की संरक्षण संपोषण करने वाली सज्जन शक्तियों के रक्षण हेतु प्रतिबध्द थे वे व्यक्ति की तपस्या को नहीं उनके आशय को देखते है, सदभावना पूर्ण आशय और लोक कल्याण के उद्देश्य रखने वाले भक्त ह्रदय वाले साधक की अल्प साधना ही उन्हें प्रसन्न करने के लिए पर्याप्त है |जबकि महादेव शिव समदर्शी है उन्हें साधक के आशय की अपेक्षा साधक की तपस्या की तीव्रता प्रभावित कर सकती शिव जी स्वभाव से भोले भी है उनकी उदारता की कृपा दुष्ट सज्जन सभी व्यक्तियों पर सामान रूप से बरसती है \ब्रह्मदेव सृष्टि के निर्माता है इसलिए एक बार वे वरदान देने के बाद यह नहीं देखते है \उसका परिणाम क्या होगा इसलिए दैत्य प्राचीन काल में भगवान् विष्णु की साधना न कर महादेव शिव और ब्रह्मदेव की तपस्या कर शक्तियां और अमरता प्राप्त कर लेते थे

Friday, October 28, 2016

लक्ष्य

सौंदर्य उसके लिए है
जो दृष्टि समन्न हो
वैचारिक दृष्टि से नहीं विपन्न  हो
आनंद उसके लिए है
जिसके भीतर अमृत तत्व है 
सकारात्मक सोच हो रमा हुआ सत्व है 
लक्ष्य उनके लिए 
जिन्हें दिखते उतुंग शिखर हो 
बहता हो श्रम सीकर प्रतिभा प्रखर हो
ज्ञान उसके लिए जिन्हें जिज्ञासा हो
सदा रहे अतृप्त अनंत पिपासा हो 
जीवन उसके लिए जो गतिमान हो 
रचते रहे निरंतर अनेक प्रतिमान हो

माँ शारदा का वाहन हंस क्यों है ?

हंस  माँ शारदा का वाहन  है 
परन्तु माँ शारदा ने हंस को ही 
वाहन के रूप में क्यों चुना 
 यह विचारणीय प्रश्न  है
हंस का स्वभाव होता है 
वह दूध  में जल होने पर दूध को पी लेता है 
जल को  छोड देता है 
कंकड़ और मोती के मिश्रण में से 
मोती को चुग लेता है कंकड़ को छोड़ देता है 
सत्पुरुषों का लक्षण यही होता है कि 
 सत  और असत्य का भेद कर
 असत्य  छोड कर सत्य को ग्रहण का लेते है 
ज्ञान और अज्ञान में भेद कर 
अज्ञान को छोड़ ज्ञान को ग्रहण कर लेते है 
सत्पुरुषों का आचरण उज्ज्वल  होता है 
 इसलिए हंस का रूप भी धवल होता है
माँ शारदा उसी व्यक्ति की बुध्दि में 
विराजमान होती है 
हंस के समान सत  और असत  में
 भेद करने में समर्थ होता है 
ऐसे व्यक्ति की बुद्धि नीर क्षीर विवेक से युक्त होने से उसे सहज ही आविष्कारक दृष्टि प्राप्त होती है 
हंस के समान कल्पना और सृजना के पंख 
उसे उपलब्ध होते है