दशहरे के पर्व पर रावण दहन किया जाना
परम्परा के रूप में चला आ रहा है
रावण दहन के पूर्व हमें राम और रावण के परस्पर संबंधो के
बारे में सोचना चाहिए
रावण और कुम्भकर्ण कौन थे ?
रावण और कुम्भकर्ण भगवान् विष्णु के
अभिशप्त द्वारपाल जय- विजय थे
जो शाप वश धरती पर आये थे और शाप से मुक्त होकर
पुन भगवान् विष्णु के धाम उनकी रक्षा हेतु वापस चले गये
सभी इस तथ्य को जानते है कि
श्री राम भगवान् विष्णु केअंशावतार थे
जो अपना प्रयोजन पूर्ण होने के उपरांत भगवान् विष्णु के
वृहद् अंश में समाहित हो गए
आखिर जय -विजय ने रावण और कुम्भकर्ण के रूप में जन्म
और भगवान् विष्णु ने श्रीराम के रूप में अवतार धारण क्यों किया था
ऐसा उन्होंने समाज को बुराई को छोड़ने और अच्छाई को अपनाने
तथा सदा बुराई पर पर अच्छाई की विजय होती है
का सन्देश समाज तक पहुंचाने के लिए किया था
परन्तु हमने दशहरे पर रावण दहन कर रावण दहन के पीछे छुपे
सच्चे संदेशो को छोड़ दिया
कभी हमने ध्यान दिया है कि
रावण की अट्टहास पूर्ण हंसी के पीछे क्या रहस्य है ?
रावण महान ज्ञानी और विद्वान और भूत भविष्य का ज्ञाता था
उसे उसकी मृत्यु का पूर्वानुमान था
वह जानता था की उसकी मृत्यु सुनिश्चित है
किन्तु मृत्यु पूर्व उसकी उन्मुक्त हंसी
स्वयम मृत्यु की देवी में भय का भाव उत्पन्न करने के लिए पर्याप्त थी
रावण जानता था की जन्म मृत्यु जीवन के शाश्वत सत्य है
कोई व्यक्ति अमरता प्राप्त नहीं कर सकता
किन्तु रोते ,बिलखते ,रुग्ण होकर मृत हो जाना
हमारी अनश्वर आत्मा की अमरता के लिए जन्म मृत्यु के चक्र से
मुक्ति प्राप्त करने लिए घातक है
यदि हमें इस चक्र से मुक्ति प्राप्त करना है
परमात्मा के चरणों में स्थान प्राप्त करना है तो
हमें स्वस्थ और प्रसन्न होकर मृत्यु का वरण करना होगा
रावण के अट्टहास ने मृत्यु मातम नहीं उत्सव बनाया
उत्सव भी ऐसा जो उसकी मृत्यु हजारो वर्ष व्यतीत होने बाद भी
दशहरा पर्व के रूप चला आ रहा है
यदि सही अर्थो में माना जाय तो दशहरा पर्व
बुराई पर अच्छाई की विजय के साथ
मृत्यु पर जीवन की विजय तथा आत्मा की अमरता
एवं आत्म तत्व के मोक्ष का उत्सव है

परम्परा के रूप में चला आ रहा है
रावण दहन के पूर्व हमें राम और रावण के परस्पर संबंधो के
बारे में सोचना चाहिए
रावण और कुम्भकर्ण कौन थे ?
रावण और कुम्भकर्ण भगवान् विष्णु के
अभिशप्त द्वारपाल जय- विजय थे
जो शाप वश धरती पर आये थे और शाप से मुक्त होकर
पुन भगवान् विष्णु के धाम उनकी रक्षा हेतु वापस चले गये
सभी इस तथ्य को जानते है कि
श्री राम भगवान् विष्णु केअंशावतार थे
जो अपना प्रयोजन पूर्ण होने के उपरांत भगवान् विष्णु के
वृहद् अंश में समाहित हो गए
आखिर जय -विजय ने रावण और कुम्भकर्ण के रूप में जन्म
और भगवान् विष्णु ने श्रीराम के रूप में अवतार धारण क्यों किया था
ऐसा उन्होंने समाज को बुराई को छोड़ने और अच्छाई को अपनाने
तथा सदा बुराई पर पर अच्छाई की विजय होती है
का सन्देश समाज तक पहुंचाने के लिए किया था
परन्तु हमने दशहरे पर रावण दहन कर रावण दहन के पीछे छुपे
सच्चे संदेशो को छोड़ दिया
कभी हमने ध्यान दिया है कि
रावण की अट्टहास पूर्ण हंसी के पीछे क्या रहस्य है ?
रावण महान ज्ञानी और विद्वान और भूत भविष्य का ज्ञाता था
उसे उसकी मृत्यु का पूर्वानुमान था
वह जानता था की उसकी मृत्यु सुनिश्चित है
किन्तु मृत्यु पूर्व उसकी उन्मुक्त हंसी
स्वयम मृत्यु की देवी में भय का भाव उत्पन्न करने के लिए पर्याप्त थी
रावण जानता था की जन्म मृत्यु जीवन के शाश्वत सत्य है
कोई व्यक्ति अमरता प्राप्त नहीं कर सकता
किन्तु रोते ,बिलखते ,रुग्ण होकर मृत हो जाना
हमारी अनश्वर आत्मा की अमरता के लिए जन्म मृत्यु के चक्र से
मुक्ति प्राप्त करने लिए घातक है
यदि हमें इस चक्र से मुक्ति प्राप्त करना है
परमात्मा के चरणों में स्थान प्राप्त करना है तो
हमें स्वस्थ और प्रसन्न होकर मृत्यु का वरण करना होगा
रावण के अट्टहास ने मृत्यु मातम नहीं उत्सव बनाया
उत्सव भी ऐसा जो उसकी मृत्यु हजारो वर्ष व्यतीत होने बाद भी
दशहरा पर्व के रूप चला आ रहा है
यदि सही अर्थो में माना जाय तो दशहरा पर्व
बुराई पर अच्छाई की विजय के साथ
मृत्यु पर जीवन की विजय तथा आत्मा की अमरता
एवं आत्म तत्व के मोक्ष का उत्सव है
