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Tuesday, September 9, 2014

प्रीती में आलोक आनंद है

प्रेम के भीतर ईश्वर   है 
इस सच्चाई को जानने के बावजूद 
विशुध्द प्रेम की अभिव्यक्ति को 
कोई स्वीकार नहीं करता 
प्रेम के भीतर 
किसी न किसी   प्रकार की मिलावट 
सभी को चाहिए 
प्रेम विशुध्द  हो तो करुणा पिघलती है 
करुणा में माँ और मानवता है 
संवेदना को  तरलता मिलती है
 मानवीय व्यवहार की सरलता  सच्ची पूजा है 
 प्रेम  के ढाई अक्षर में अद्भुत ऊर्जा है
 प्रीती की दीप्ती पाकर प्रतिभाये उभरती  निखरती है 
प्रीती  में आलोक आनंद है ईर्ष्या कहा ठहरती है