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Friday, October 16, 2015
साहित्य साहित्यकार और पुरूस्कार
वर्तमान में साहित्यकारों द्वारा
सम्मान लौटाए जाने की की खबरों को
मीडिया में प्रमुखता से प्रकाशित किया जा रहा है जितनी सुर्खिया पुरूस्कार लौटाए जाने की
खबरों ने पाई है
उतनी तो जब साहित्य अकादमी द्वारा
पुरूस्कार दिया गया था
तब भी पुरुस्कृत साहित्यकारों को नहीं मिली थी बहुत साहित्यकारों के बारे में
लोगो को तब जानकारी मिली
जब उनके बारे में पुरूस्कार लौटाए जाने की
खबरे प्रकाशित हुई है
याने की साहित्यकारों द्वारा पुरूस्कार लौटाया जाना भी एक सुखद स्मृति रहेगी
कम से कम पुरुस्कृत साहित्यकारों की
गुमनाम कृतिया चर्चा की विषय
तो हाल ही के कुछ दिनों तक बनी रहेगी
प्रश्न यह है साहित्य किसे कहेंगे
जो समाज का हित करे
जो समाज का हित करे
परन्तु साहित्यिक संस्थाये अपने अपने
समूह के साहित्यकारों के हित साधने का
माध्यम बस रह गई गई है
विपरीत विचार धारा वाला लेखक या कवि
कितनी भी उच्च कोटि की
रचना या कृति का सृजन कर दे
संस्थाये कभी भी उन्हें पुरुस्कृत करने योग्य नहीं समझती।
सूक्ष्मता से देखे तो पुरूस्कार लौटाने वाले साहित्यकार किसी जमाने में
उसी संस्था के सर्वेसर्वा थे
जिस संस्था के पुरूस्कार वे लौटा रहे है
आशय यह है
आशय यह है
ऐसे साहित्यकार्यो ने साहित्यिक संस्थाओ को स्वयं या स्वयं के निकटस्थ कथित साहित्यकारों की
स्वार्थ साधना का ही माध्यम बनाया था ।
ऐसे साहित्यकारों और साहित्यिक संस्थाओ के कारण साहित्य की नवोदित प्रतिभाये दम तोड़ रही है साहित्य की कई विधाए समाप्त होने की स्थिति में है
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