शारदेय नवरात्रि के पश्चात आने वाली पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहा जाता है इस दिन खुले आसमान के नीचे खीर बना कर उसे चंद्र किरणों में रखा जाता है रात को चंद्र किरणों के माध्यम से वर्षित सुधा बूंदों को क्षीर पात्र में एकत्र होने के बाद उसे ग्रहण किया जाता है परन्तु इसका तार्किक अर्थ क्या है ?इसका समझना आवश्यक है शारदेय नवरात्रि में शक्ति साधना की उष्णता को शांत किया जाना आवश्यक है खीर जो दूध चावल मेवे से बनती है उसका ओषधीय महत्व होता है वह शक्ति जिसमे उष्णता हो कभी भी किसी का कल्याण नहीं करती है उसके रचनात्मक दिशा देने के लिए उसे आप्त और सौम्य पुरुषो का सान्निध्य चाहिए ।उष्णता से युक्त शक्ति को एकदम से शीतल किये जाने से तप से प्राप्त साधना पर प्रतिकूल पड़ सकता है शक्ति क्षय होने की संभावना विद्यमान रहती है इसलिए चद्रमा रूप आप्त एवम् शीतल और सौम्यता के देव प्रतीक की किरणों से निकली सुषमा जब शरद ऋतू में मौसम में घुल कर क्षीर में प्रविष्ट होती है तो वह खीर अमृत का रूप धारण कर लेती है हमारे तन और मन की उष्णता को शांत कर नवरात्र साधना से संचित शक्ति की उष्णता समाप्त कर उसे समुचित दिशा प्रदान कर देती है
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Monday, October 26, 2015
अभाव का प्रभाव
अभाव दो प्रकार के होते है
एक तो वास्तविक अभाव
दूसरा कृत्रिम अभाव है
कृत्रिम अभाव वे होते है
जिनके रहते हमारा जीवन यापन हो सकता है
परन्तु हमें हमारी सुविधा भोगी प्रवृत्ति
कृत्रिम साधनो के अधीन कर देती है
जो लोग संन्यास की ओर
अग्रसर होने की ईच्छा रखते हो
उन्हें कृत्रिम साधनो से जुड़े
अभावो में रहने का अभ्यास करना चाहिए ।
आश्चर्य तब होता है
जब संन्यास मार्ग से जुड़े कुछ व्यक्ति
कृत्रिम साधनो के बिना
अपना नियमित जीवन व्यतीत करने में
असमर्थ हो जाते है ।
कृत्रिम साधनो के बिना
जीवन यापन करने के लिए
व्यक्ति में वास्तविक वैराग्य की
भावना होनी आवश्यक है
वास्तविक वैराग्य
संतोष और अपरिग्रह के व्रत के पालन
किये जाने से ही संभव है
व्यक्ति कितने ही बड़े व्रत कर ले
दिखने में सामान्य व्रत नहीं कर सकता है
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