अद्विविक पब्लिकेशन से प्रकाशित पुस्तक भारतीय कला के बहु आयाम कला वैदिक काल से लगाकर जैन एवं बौद्ध युग के दौरान शिल्प सृजन भित्ति चित्रों लघु चित्रों और उनके पीछे छुपे जीवन और अध्यात्म दर्शन को स्पष्ट करती है l प्राचीन वैदिक ग्रंथों में कलाओं के बारे में संदर्भ देती है l भाषा की सहजता सरलता इस पुस्तक के अध्यायों की विशेषता है l
संगीत को छोड़ कर यह पुस्तक कला के विविध आयाम पर प्रकाश डालती है इस पुस्तक को पढ़ते पढ़ते निरंतर नवीनता का अहसास होता है ऊर्जा और उत्साह मिलता है
कला मर्मज्ञ आनंद कुमार स्वामी के कृतित्व एवं व्यक्तित्व पर आधारित एक अध्याय हमें यह बताता है कि किस प्रकार एक भू गर्भ शास्त्री कलात्मक रुचि के कारण देशों और संस्कृतियों की सीमाओं से परे जाकर सागर जैसा विस्तीर्ण शोध कार्य करता है l
महान चित्रकार राजा रवि वर्मा के बारे में इस पुस्तक में समिल्लित आलेख उपनिवेश कालीन स्थितियों में अभावों के बीच पनपती प्रतिभा का विस्तार से परिचय कराता है l सचमुच में इस पुस्तक को पढ़ने से पहले राजा रवि वर्मा और उनके भारतीय चित्रकला के प्रति योगदान के प्रति और उनकी आध्यात्मिक रुझान को जाना ही नहीं था l
इस पुस्तक में पुरातत्वविद डॉ वाकणकर के पुरातात्विक शोध और उनके व्यक्तित्व को उल्लेखित किया है साथ ही काला के प्रति गांधीवादी बोध को रेखांकित किया है l
निश्चय ही यह पुस्तक कला ए बहुआयामी पक्ष की सूक्ष्मताओं को विभिन्न भारतीय रियासतों में बिखरी शैलियों से परिचित कराती है l
