Total Pageviews

Friday, May 11, 2012

श्रद्धा क़ा केन्द्रीकरण एवं मनोकामनापूर्ति

प्रतिमा ,मंदिर ,तीर्थ ,आत्मा ,परमात्मा ,और मनोकामना सिध्दी का परस्पर क्या सम्बन्ध है 
प्रतिमा जिसे शिल्पकार निर्मित करता है 
वह प्रतिमा जो ईष्ट की हो मंदिर में स्थापित की जाती है 
प्रतिमा को मंदिर स्थापित करने मात्र से वह पूजी नहीं जाती 
 बल्कि प्रतिमा में प्राण प्रतिष्ठा मंत्रो एवं विधि-विधान किये जाने के बाद ही प्रतिमा में परमात्मा का अंश स्थापित होने के पश्चात पूजा जाता है   
प्रतिमा.में परमात्मा अंश किस मात्रा में प्रतिष्ठित हुआ 
यह उस प्रतिमा के साधक की साधना पर निर्भर करता है 
वह प्रतिमा जिसकी अधिक  व्यक्तियों द्वारा  दर्शन एवं पूजा की जाती वह उतनी  मात्रा में चमत्कारिक परिणाम  देती है 
शनै शनै  ऐसी प्रतिमा और मंदिर तीर्थ बन जाता है 
दर्शनार्थियो.की अधिक संख्या से प्रतिमा में 
परमात्म अंश की चैतन्यता का भी सम्बन्ध होता है 
शास्त्रों के अनुसार आत्मा परमात्मा का अंश होती है
  दर्शनार्थियों  में स्थित आत्म तत्व जब निरंतर प्रतिमा के समक्ष समर्पण एवं श्रध्दा भाव से  निहारता है अर्चना करता है तो श्रध्दा प्रतिमा में केंद्रीकृत हो जाती है 
धीरे धीरे  दर्शनार्थियों की बढती संख्या के अनुपात में 
प्रतिमा के प्रति श्रध्दा  बहु गुणित  होती जाती है  और प्रतिमा में परमात्म अंश में विस्तार होने लगता है 
चेतना एवं ऊर्जा अनंत संचार  होने लग जाता  है तब ऐसी चेतना एवं ऊर्जा में 
निराकार ब्रह्म का सहज ही वास होने पर  
श्रध्दालुगण  की मनोकामनाये पूर्ण होने लग जाती है 

Friday, May 4, 2012

पांडव भ्राता एवं परिवार प्रबंधन

 सामान्यत  किसी भी परिवार में  का एक व्यवसाय होता परिवार में जितने भाई होते है 
वे सभी एक ही प्रकार के व्यवसाय में संलग्न रहते है
 तथा एक ही प्रकार की कार्य कुशलता उनमे पाई जाती है 
परिणाम स्वरूप एक सीमा के बाद एक ही परिवार के भाइयो के बीच 
व्यवसायिक स्पर्धा प्रारम्भ.हो जाती है 
ऐसी स्थिति में परिवार के व्यवसाय में वृध्दि  के स्थान पर व्यवसाय में ठहराव तथा
 परिवार के सदस्यों में परस्पर विद्वेष भाव पनप जाता है 
परिवार में सामंजस्य स्थापित करते हुए 
किस प्रकार से व्यवसायिक कुशलता प्राप्त की जाय 
परिवार में.सौहार्द का भाव कैसे बनाए रखा जाए 
इन प्रश्नों के उत्तर महाभारत के पांडव भाइयो में निहित है पांडव  भाइयो मे परस्पर जितना सौहार्द तथा अपने अपने क्षेत्र में जितने कुशल थे 
वैसा अनुपम उदाहरण इतिहास में मिलना मुश्किल है 
पांडवो में सबसे बरिष्ठ भ्राता युधिष्ठर सत्य वादिता एवं द्युत क्रीडा में पारंगत माने जाते थे 
वे घनघोर प्रतिकूल परिस्थतियो में स्थिर भाव में रहने की  सामर्थ्य रखते थे  उनका यह गुण अज्ञातवास ,कुरुक्षेत्र में युध्द के दौरान काम आया 
दूसरा भाई भीम का पाक कला में प्रवीण गदा युध्द का महारथी  अत्यंत बलशाली  होना उनके जीवन में आई सभी चुनौतियों को सुलझाने में
 काम आया 
तीसरा भाई अर्जुन का धनुर्विद्या में तथा नृत्य कला में प्रवीण होना 
तत्कालीन परिस्थितियों में पांडवो के लिए वरदान सिध्द हुआ 
इसी प्रकार चतुर्थ भ्राता  नकुल 
 तलवार चलाने का कौशल्य होना दुर्लभ था 
 पाचवे  भ्राता सहदेव अश्वपालन तथा अश्व संचालन में 
दक्ष होना महाभारत युध्द में प्रयोग किये जाने वाले मुख्य वाहन अश्वो की देख रेख के लिए 
अति महत्वपूर्ण थे इसलिए परिवार की सफलता के लिए सभी सदस्यों में भिन्न -भिन्न क्षेत्रों में प्रतिभा एवं कुशल प्रबंधन आवश्यक है   

Wednesday, May 2, 2012

नारी एवम नदी

नारी और नदी को एक दूसरे का पर्याय माना जाता है 
नदी की नियति  नारी की नियति से भिन्न नहीं होती नदी अपने प्रवाह एवं प्रकृति के अनुसार अपना मार्ग 
एवं अपनी दिशा तय करती  है 
उसी प्रकार  नारी अपने आचरण एवं चरित्र के अनुसार 
समाज में अपना सम्मान एवम स्थान तय करती है 
जहा पुण्य  सलिला ;नदि गंगा भगवान् विष्णु के चरणों से

प्रगट होंकर भगवान  शिव जी के मस्तक पर विराजमान

होकर सृष्टि  को सिंचती है 
उसीप्रकार से माँ नर्मदा शिव जी के स्वेद से उत्पन्न होकर 
अपने प्रवाहित होने की सार्थकता  प्रतिपादित करती  तो दोनों नदिया पूज्यनीय बन जाती है 
उसी तरह श्रेष्ठ नारिया संस्कारित परिवारों में संस्कार चरित्र ,ज्ञान के द्वारा सम्पूर्ण समाज के मध्य सम्मान माता के सम्मान पाती है 
और अपनी सृजनात्मकता से अपने जीवन को सार्थक बनाती है 
यदि कोई स्त्री भगवान् विष्णु एवं  शिव जैसे संस्कारवान  वातावरण से युक्त परिवेश में अपने जीवन को गतिमान नहीं करती है 
तो उसकी नियति ठीक उस नदी की तरह होती है 
जो बरसात में बाढ़ और गर्मी में सूख जाती है  अर्थात उस स्त्री के स्वभाव में निरंतरता नहीं  रहती  
जिस प्रकार से ऐसी नदिया उनके किनारों पर बीहड़ बनाती है

उसी  प्रकार  से  उन स्त्रियों का
जीवन प्रतिकूलताओ से भरा हुआ रहता है 
वे अपने साथ मगरमच्छ  जैसी समस्याओं को साथ लेकर चलती है
 तथा ऐसी स्त्रियों के जीवन में ईर्ष्या एवम घृणा उसी 
प्रकारसे रहते है जिस प्रकार से बीहड़ से युक्त नदी के
 बीहड़ो में  जहरीले सर्प अजगर व डाकू रहते है 

Monday, April 30, 2012

ज्योतिर्लिग में निराकार पर ब्रह्म का वास

भगवान् शिव के मंदिर में शिव जी के दर्शन ज्योतिर्लिंग के रूप में होते है 
 ज्योतिर्लिंग अर्थात निराकार  ईश्वर जिसका कोई आकार नहीं हो 
जो ज्योति स्वरूप हो ज्योतिर्लिंग के रूप में उसकी मंदिर में स्थापना का उद्देश्य यह नहीं है 
कि हम अनावश्यक कर्मकांड में लिप्त रहे 
अनावश्यक कर्मकांड से मुक्ति से मानव रहे 
इसलिए ज्योतिर्लिंग की आराधना 
प्रकृति में सहज उपलब्ध जल एवम बिल्ब पत्र से की जाती है 
 हम देखते है की शिव जी के ज्योति स्वरूप की परिक्रमा पूर्ण रूपेण नहीं की जाती है
हठ योग में ज्योति के समक्ष साधक द्वारा की गई साधना को त्राटक कहा गया है 
त्राटक साधना के साधक को अद्भुत परिणाम प्राप्त होते है
 शिव जी के ज्योति स्वरूप के दर्शन करने के बाद यह विधान है 
कि मंदिर के गर्भ गृह के बाहर आकर नंदी के नेत्रों के स्तर तक आकर दर्शनार्थी ज्योतिर्लिंग के दर्शन करे
 इसका यह तात्पर्य यह है कि 
 नंदी जी निराकार ईश के समक्ष समर्पण भावना को द्योतक है 
समर्पण के अभाव में ईश्वरीय तत्व से साक्षात्कार नहीं हो सकता है 
इसलिए साधक की नंदी के समान समर्पण भावना बनी रहे 
इस प्रक्रिया को शिव मंदिरों ज्योतिर्लिग के समक्ष नंदी को दंडवत करते हुए बताया गया है 
यदि हम शिव मंदिर में दर्शन करते हुए उपरोक्त भावना को आत्मसात कर पाए 
तो शिव के ज्योति स्वरूप से सहज ही साक्षात्कार संभव है 
अन्यथा हमारा जीवन अनावश्यक आडम्बरो में पडा रहेगा  

Sunday, April 22, 2012

श्रीराम रूपी ईश्वरीय तत्व की प्राप्ति कैसे हो

राम कहा?
 कैसे ?
किन परिस्थितियों में उत्पन्न होते है? 
उक्त प्रश्नों के उत्तर उनके माता पिता जन्म भूमि के नामो में निहित है 
उल्लेखनीय यह है कि 
श्रीराम के पिता दशरथ ,माता कौशल्या ,विमाता सुमित्रा ,जन्मभूमि अयोध्या थी 
अर्थात  पिता दशरथ तात्पर्यित दश इन्द्रियों का रथी   पाच ज्ञान इन्द्रियों व पांच कर्म इन्द्रियों पर शासन करने वाला हो 
माता कौशल्या का कर्म का कौशल्य जिसके पास हो 
विमाता सुमित्रा सा मैत्री पूर्ण व्यवहार हो 
जहा सत्कर्म कि अयोध्या हो 
वहा श्रीराम रूपी ईश्वरीय का  तत्व स्वतः अवतरित हो जाता है 
इसलिए यदि हमे सचमुच में श्रीराम तत्व को पाना हो तो दशरथ के सामान दस इन्द्रियों को अनुशासित कर किसी भी कार्य को पूर्ण कौशल्य से करना चाहिए 
तथा मित्रता पूर्ण व्यवहार जीवन में अंगीकार कर  
सत्कर्म कि अयोध्या में जीवन यापन करना चाहिए   

दस इन्द्रियों के रथी दशरथ

दशरथ जो भगवान् श्रीराम के पिता थे  
रामचरितमानस ग्रन्थ के अनुसार कहा जाता है
 उन्होंने श्रीराम जो उनके पुत्र थे के वियोग में प्राण दे दिए थे  
किन्तु प्रश्न यह उठता है
 की प्राचीन काल में यथा गुण तथा नाम रखे जाने का प्रचलन था दशरथ का तात्पर्य यह होता है 
की दस रथो पर एक साथ नियंत्रण रखने वाला व्यक्ति 
दस  रथ कौनसे ?
इसका आशय यह है की मानव शरीर में दस इन्द्रिया होती है 
जिनमे पांच ज्ञान इन्द्रिया पांच कर्म इन्द्रिया  
महाराजा दशरथ वे व्यक्ति थे जिन्होंने दसो इन्द्रियों को एक साथ साध रखा था  
गीता में ऐसा व्यक्ति जिसने सुख दुःख से  उत्पन्न  प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त कर ली हो स्थित प्रज्ञ कहा गया है
सामान्यत कोई भी व्यक्ति इन्द्रियों के वशीभूत होकर गलत कार्य कर बैठता है इन्द्रियों के वशीभूत होकर राग द्वेष काम क्रोध ,लोभ ,मोह ,इत्यादी वृत्तियों के अधीन रहता है
 किन्तु महाराज दशरथ जिन्होंने दस इन्द्रियों पर नियंत्रण कर लिया हो का पुत्र वियोग में रोना और प्राणों का त्याग कर देना अस्वाभाविक प्रतीत होता है  
तार्किक दृष्टि से दशरथ जैसे स्थित प्रज्ञ एवम दस इन्द्रियों के रथी का श्रीराम के वनवास गमन के दौरान प्राण त्याग करने का अर्थ सामने यह आता है 
कि महाराजा दशरथ एक न्याय प्रिय राजा थे 
वे किसी भी परिस्थिति में किसी भी पक्ष के साथ अन्याय नहीं कर सकते थे 
परन्तु कैकयी को दिए गये वचन के कारण जो श्रीराम के साथ जो अन्याय हुआ वे उसके कारण अत्यंत विचलित हो गये थे 
जीते जी वे श्रीराम के साथ हुए अन्याय को देख पाने में समर्थ नहीं थे इसलिए उनका प्राण त्यागना अपरिहार्य हो गया था 
दूसरी और श्रीराम ने अपने पिता के वचन की लाज रखने हेतु वनवास प्रस्थान इसलिए किया 
क्योकि श्रीराम विष्णु के अवतार थे 
विष्णु भगवान के परम भक्त महाराजा दशरथ थे 
भगवान् सदा भक्त द्वारा दिए गए वचन की लाज रखते है 
जिसके लिए चाहे उन्हें कुछ भी क्यों न करना पड़े कलयुग में इसका उदाहरण नरसिंग मेहता भगत है सतयुग में भक्त प्रहलाद है 

Wednesday, April 18, 2012

इतिहास

इतिहास क्या है ?
बीता हुआ समय 
बीता हुआ समय व्यक्ति ,समाज 
या देश का हो सकता है 
सामान्य रूप से देश या समाज का इतिहास 
अध्ययन का विषय होते है 
व्यक्तिगत इतिहास आत्मकथा की शक्ल में होता है 
इतिहास क्यों लिखा और पढ़ा जाता है ?
त्रुटियों की पुनरावृत्ति न हो 
बीते हुए अनुभवों से लाभ उठाया जाए और भविष्य संवारा जाय 
इसलिए इतिहास लिखा और पढ़ा जाता है 
मात्र अतीत के गौरव पूर्ण स्मृतियों को याद कर उनमे खो जाने के लिए इतिहास नहीं होता 
गौरव पूर्ण स्मृतियों से तो हम आगे बढ़ने की प्रेरणा ग्रहण करते है 
पुरुषार्थी व्यक्ति ,चरित्रवान व्यक्तियों से परिपूर्ण समाज या देश नित्य नवीन नए 
कीर्तिमान बनाते है स्वयं आगे बढ़ते है समाज ,देश को आगे बढाते है 
और निरंतर नवीन इतिहास  रचाते है 
ऐसे व्यक्ति ,समाज ,देश पर  इतिहासविद  नया इतिहास लिख पाते है 
इतिहास बनाने वाले व्यक्ति इतिहास पुरुष ही नहीं 
महापुरुष कहलाते है 
अकर्मण्य पुरुष तो मात्र अतीत की स्वर्णिम स्मृतियों के बल पर ही जी पाते है 
इसलिए इतिहास के पृष्ठों पर अंकित गौरव में अभिभूत रहने के बजाय 
नित्य नवीन इतिहास बनाओ 
अतीत की त्रुटियों से सीखो परिपूर्णता के साथ पुरुषार्थ करो 
और इतिहास के इस विलक्षण गुण से सुखद भावी का निर्माण करो