शरीर से अशरीर की यात्रा अध्यात्म का मार्ग है आत्मा से जुड़ी अनुभूतिया जितनी प्रखर होगी आध्यात्मिक गहराईयां उतनी गहरी होती जाती है व्यक्ति जब तक जीवित रहता है उसकी अनुभूतिया इन्द्रियों से जुड़ी रहती है परंतु व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात के शरीर का अंतिम संस्कार हो जाता है इंद्रिया नष्ट हो जाती है आत्मा शेष रहती आत्मानुभूतिया बची रहती है आत्म बल शेष रहता है आत्म ज्ञान शेष रहता है आत्मा से जुड़े संस्कार और विचार शेष रहते है इसलिए व्यक्ति के लिए यह अनिवार्य हो जाता है कि वह जीवित रहते वह आत्मा ऐसा कार्य करे कि उसके आत्म बल आत्म ज्ञान में वृध्दि हो प्राणों की सिध्दि हो
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Monday, April 22, 2019
Saturday, April 6, 2019
बेटी में सपना साकार रहा
न मानव के अधिकार रहे
न करुणा पावन प्यार रहा
मानव मानव से दुखी रहा
और हृदयविहीन व्यापार रहा
मन के भीतर न ख़ुशी रही
नहीं खुशिया का श्रृंगार रहा
आंसू अविरल है नयन बहे
सुख सपनो का संसार ढहा
दुःख से धरती माँ सिसक रही
जन अपमानित मन चीत्कार रहा
दीन दुर्बल को यहाँ चुन चुन कर
शव क्षत विक्षत होता संहार रहा
हम दिवस मनाते अधिकारो के
हर पल हमको धिक्कार रहा
बीता जीवन अंधियारे में
और उजियारा उनके द्वार रहा
ढोता बचपन है बस्तों को
नाजुक कंधो पर भार रहा
बेटो में वत्सलता बाँट रहे
बेटी में सपना साकार रहा
Wednesday, April 3, 2019
भाग्यशाली
परिवार के सदस्य होना अलग बात है
और आत्मीय होना अलग बात है
आत्मीय वे होते है
जो अपनों के ह्रदय की भावनाओ को समझ सके
वे नहीं जिनके समक्ष हम अपनी भावनाये प्रकट ही न कर सके
वर्तमान में कई परिवार ऐसे दृष्टिगत होते है
जहां एक व्यक्ति अपने हृदय की बात नहीं कह सकता
विशेषकर परिवार के उस सदस्य के सामने
जो नकारात्मक वृत्तियों से भरा हुआ हो
ऐसा व्यक्ति तरह तरह के दुराग्रह
और पूर्वाग्रह के रहते किसी की नहीं सुनता है
अपने द्वारा गढ़ी हुई मिथ्या धारणाओं के समक्ष
हर तथ्य को असत्य मानता है
ऐसा व्यक्ति परिवार मे होकर भी बेगाना होता है
वही कुछ लोग परिवार के सदस्य न होकर भी आत्मीय होते है
शब्दों से परे वे ह्रदय की हर पीड़ा को समझते है
वे लोग बहुत भाग्य शाली होते है
जिन्हे अपने परिवार में ही आत्मीय जन पाए है
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